THE POETRY SPEAKS
भाग्य या कर्म
भाग्य बोला—
“जो लिखा है,
वही तो होगा,
क्यों फिर मनुष्य
इतना रोए,
इतना जागे,
इतना बोए?”
कर्म हँसा—
“जो लिखा है,
वह सब कुछ
कहाँ होता है?
बीज पड़ा हो
मुट्ठी में तो
वन अपने-आप
कहाँ होता है?”
भाग्य बोला—
“मैंने राहें
पहले बाँटीं,
किसी को फूल,
किसी को काँटे।”
कर्म बोला—
“सच है, लेकिन
काँटों पर भी
चलना होगा,
गिरकर फिर से
उठना होगा,
अपने पथ को
गुनना होगा।”
कुछ को मिलता
सुख का आँगन,
कुछ को मिलता
दर्द का सावन।
कुछ के हिस्से
दीप जलें,
कुछ के हिस्से
रात मिले।
पर—
रात मिले तो
क्या रुक जाना?
दीप न मिले तो
क्या बुझ जाना?
भाग्य नदी है,
कर्म किनारा,
भाग्य धारा,
कर्म पतवारा।
धारा अपनी
चाल चलेगी,
नाव मगर
तुम्हीं खेओगे।
हवा तुम्हारे
वश में कब है,
पर पाल कहाँ
तक तानो—
यह निर्णय
तुम्हारा है।
हर पीड़ा को
कर्म न कहना,
हर हार को
भाग्य न कहना।
कुछ आँसू
बस आँसू होते,
कुछ घावों के
नाम न होते।
मनुष्य न पूरा
भाग्य का बंधन,
न कर्मों का
पूर्ण सृजन।
वह तो दोनों
के बीच खड़ा—
आधा मिट्टी,
आधा सपना।
हथेली में
रेखाएँ होंगी,
पर उनमें
राहें कहाँ होंगी?
रेखा केवल
दिशा बताए,
पग ही आगे
राह बनाए।
जो मिला उसे
मान लिया तो
जीवन केवल
भाग्य हुआ;
जो मिला उसे
गढ़ लिया तो
वही मनुष्य
कर्म हुआ।
इसलिए जब भी
मन घबराए,
भाग्य को मत
दोष सुनाए।
बस अपने
अंतर से पूछो—
“जो मेरे हाथ में है,
मैं उसका क्या करूँ?”
जो मिल जाए—
उसमें जीना,
जो न मिले—
उसको सहना।
जो बदल सको—
बदलते जाना,
जो न बदल सको—
उसे समझना।
क्योंकि जीवन
का सच शायद
इतना ही है—
भाग्य ने
जो पृष्ठ दिया,
कर्म ने
जो शब्द लिखे;
उन दोनों के
बीच कहीं
मनुष्य ने
अपना जीवन जिया।
और जब समय
अंतिम पृष्ठ पर
धीरे से
कलम रख देगा,
तब शायद
भाग्य भी मुस्कराकर कहेगा—
“जो मैंने दिया,
वह तो सबको मिला;
पर तुमने उससे
क्या बनाया—
यही तुम्हारा
कर्म था।”

