प्रभाष चंद्र

| अंतर्द्वंद्व मेरे भीतर एक मैं रहता है, और एक जो मुझे देखता रहता है। एक कहता है— चलो, जो मन चाहे वही करो; दूसरा धीरे से पूछता है— क्या मन की हर इच्छा सत्य होती है? एक चाहता है सब कुछ पा लेना, दूसरा जानता है कुछ पाने के लिए कुछ छोड़ना पड़ता है। एक कहता है— उसे क्षमा मत करना, उसने तुम्हें तोड़ा है। दूसरा चुपचाप कहता है— क्षमा उसे नहीं, अपने भीतर के उस दर्द को करो जो अब तक तुम्हें बाँधे हुए है। एक अतीत की सीढ़ियों पर बैठा है, बार-बार वही दृश्य दोहरा रहा है। दूसरा भविष्य की ओर देखता है और कहता है— जो बीत गया, वह तुम्हारा अनुभव है, तुम्हारी पहचान नहीं। कभी बुद्धि हृदय से लड़ती है, कभी हृदय बुद्धि को समझाता है। कभी विवेक मोह के सामने बहुत छोटा पड़ जाता है, और कभी एक छोटा-सा सत्य वर्षों पुराने भ्रम को तोड़ देता है। सबसे कठिन युद्ध किसी दूसरे से नहीं होता। वह होता है उस व्यक्ति से जो हम बन चुके हैं, और उस व्यक्ति से जो हम बनना चाहते हैं। हम दुनिया से सच बोल लेते हैं, पर स्वयं से सच बोलने में कितनी उम्र लग जाती है। | कभी हम हारकर भी अपने अहंकार को जीतता हुआ समझते हैं, और कभी झुककर पहली बार अपने भीतर खड़े हो पाते हैं। शायद जीवन अच्छे और बुरे के बीच इतना सरल संघर्ष नहीं है। शायद असली संघर्ष है— जो सही है और जो हमें प्रिय है, उन दोनों के बीच। जो करना चाहिए और जो करने का मन है, उन दोनों के बीच। जिसे छोड़ देना चाहिए और जिसे छोड़ने का साहस नहीं, उन दोनों के बीच। और इसी बीच मनुष्य धीरे-धीरे स्वयं को पहचानता है। कभी आँसुओं में, कभी मौन में, कभी पछतावे में, कभी क्षमा में, और कभी उस क्षण में जब वह स्वयं से कहता है— “मैं गलत था।” शायद वही क्षण अंतर्द्वंद्व की हार नहीं, आत्मबोध की पहली जीत है। क्योंकि मनुष्य तब नहीं बदलता जब दुनिया उसे बदलना चाहती है; वह तब बदलता है जब उसके भीतर का सत्य उसके पुराने स्व से अधिक शक्तिशाली हो जाता है। और तब— अंतर्द्वंद्व समाप्त नहीं होता, बस उसका स्वर बदल जाता है। पहले भीतर शोर था, अब प्रश्न हैं। पहले प्रश्नों में भय था, अब उनमें दिशा है। और शायद मनुष्य होने का अर्थ भी यही है— अपने भीतर उठते हर द्वंद्व को मिटा देना नहीं, बल्कि उसके बीच से अपने सत्य तक पहुँचने का साहस करना। — प्रभाष चंद्र |
