मानव-मन के उस भूलभुलैया की कविता, जहाँ प्रश्न ही प्रश्न हैं
प्रभाष चंद्र
मनुष्य
कितना विचित्र है—
बाहर से
एक देह,
एक नाम,
एक चेहरा,
एक परिचय,
और भीतर—
अनगिनत आकाश,
असंख्य प्रश्न,
अधूरी इच्छाएँ,
टूटे हुए विश्वास,
अनकहे संवाद,
और जाने कितनी
अनाम उलझनें।
वह चलता है
एक सीधी सड़क पर,
पर उसके भीतर
हजारों रास्ते
एक साथ चलते हैं।
वह मुस्कुराता है
तो भी उसके भीतर
कोई चुपचाप रो रहा होता है,
वह कहता है—
“मैं ठीक हूँ,”
और उसी क्षण
उसका मन
अपने ही भीतर
किसी अनदेखे दरवाज़े पर
दस्तक दे रहा होता है।
कितना कठिन है
मनुष्य होना!
देह को
भूख समझ आती है,
पर मन की भूख
किसे समझ आती है?
आँखों को
आँसू दिखाई देते हैं,
पर उन आँसुओं के पीछे
जो वर्षों से
जमा हुआ मौन है,
उसे कौन पढ़ता है?
शब्दों को
भाषा मिल जाती है,
पर जो बात
शब्दों तक पहुँचने से पहले ही
मन में टूट जाती है,
उसका अनुवाद
कौन करता है?
मनुष्य
दूसरों को समझने में
जीवन लगा देता है,
पर स्वयं को समझने के लिए
जब भीतर उतरता है,
तो पाता है—
वहाँ भी
एक दूसरा मनुष्य बैठा है,
जो उससे पूछता है—
“तुम वास्तव में कौन हो?”
नाम?
नहीं।
पद?
नहीं।
धन?
नहीं।
सम्बन्ध?
नहीं।
तो फिर—
कौन?
और प्रश्न
वहीं से शुरू होता है।
कभी मन कहता है—
चलो,
जो मिला है
उसी में संतोष कर लें।
बुद्धि कहती है—
नहीं,
अभी बहुत दूर जाना है।
हृदय कहता है—
किसी को
अपने पास बैठने दो।
अहंकार कहता है—
किसी के आगे
मत झुको।
स्मृति कहती है—
जो हुआ
उसे मत भूलो।
समय कहता है—
जो हुआ
उसे पीछे छोड़ दो।
भय कहता है—
रुक जाओ।
स्वप्न कहता है—
आगे बढ़ो।
और मनुष्य—
इन सबके बीच
खड़ा रहता है,
जैसे किसी चौराहे पर
खड़ा कोई यात्री,
जिसे हर दिशा
अपनी लगती है,
और कोई दिशा
पूरी तरह
अपनी नहीं लगती।
कभी-कभी
हमारी सबसे बड़ी उलझन
दुनिया नहीं होती,
हम स्वयं होते हैं।
हम चाहते कुछ हैं,
करते कुछ और हैं,
कहते कुछ और हैं,
और भीतर
कुछ और ही जी रहे होते हैं।
हम दूसरों से
सत्य की अपेक्षा करते हैं,
पर स्वयं से
कितनी बार
सच बोलते हैं?
हम कहते हैं—
“मुझे कोई नहीं समझता।”
पर क्या हमने
कभी स्वयं को
समझने का प्रयास किया?
हम कहते हैं—
“लोग बदल गए।”
पर क्या हमने
कभी अपने भीतर
बदलते हुए व्यक्ति को देखा?
हम कहते हैं—
“समय बदल गया।”
पर शायद—
समय से अधिक
हम बदल गए।
मन की भी
अपनी राजनीति होती है।
कुछ स्मृतियों को
वह सत्ता देता है,
कुछ को
निर्वासन।
कुछ चेहरों को
वर्षों तक
अपने भीतर रखता है,
कुछ चेहरों को
भूलने का अभिनय करता है।
पर मन
भूलता कहाँ है?
वह केवल
स्मृतियों को
अलग-अलग कमरों में
रख देता है।
कभी कोई गंध,
कोई गीत,
कोई शब्द,
कोई सड़क,
कोई मौसम,
अचानक
उस कमरे का दरवाज़ा खोल देता है।
और वर्षों पुराना
एक क्षण
फिर से
वर्तमान बन जाता है।
हम समय को
घड़ी से मापते हैं,
पर मनुष्य का समय
घड़ी से नहीं चलता।
कुछ क्षण
जीवन से बड़े होते हैं,
कुछ वर्ष
एक क्षण से छोटे।
किसी से पहली मुलाकात
कुछ मिनट की होती है,
पर स्मृति
उसे वर्षों तक
जीती रहती है।
किसी प्रिय व्यक्ति से
अंतिम बातचीत
कुछ शब्दों की होती है,
पर वे शब्द
पूरे जीवन
हमारे भीतर
बोलते रहते हैं।
समय
बीतता नहीं—
समय
हमारे भीतर
रूप बदलता रहता है।
मनुष्य की एक
और विचित्र आदत है—
वह भविष्य की चिंता में
वर्तमान खो देता है,
और अतीत के पश्चाताप में
भविष्य को।
जो हो चुका,
उसे बदल नहीं सकता।
जो होना है,
उसे जान नहीं सकता।
फिर भी—
मनुष्य
बीते हुए कल को
बार-बार सुधारता है
और आने वाले कल को
बार-बार डराता है।
आज—
उसके हाथ में होता है,
फिर भी
सबसे कम
आज में रहता है।
कितने प्रश्न हैं
मनुष्य के पास—
मैं कहाँ जा रहा हूँ?
क्यों जा रहा हूँ?
किसके लिए जा रहा हूँ?
जिसे पाने के लिए
भाग रहा हूँ,
क्या उसे पाकर
रुक पाऊँगा?
जिसे खोने से डरता हूँ,
क्या वह वास्तव में
मेरा है?
जिसे अपना कहता हूँ,
क्या वह मुझे
अपना मानता है?
और यदि सब कुछ
मिल भी जाए—
तो क्या
मन शांत हो जाएगा?
मनुष्य
सफलता चाहता है।
फिर सफलता के बाद
संतोष चाहता है।
संतोष मिलता नहीं,
तो और सफलता चाहता है।
फिर थक जाता है।
फिर पूछता है—
“मैं इतना सब
क्यों कर रहा हूँ?”
और कभी-कभी
बहुत देर से समझता है—
जिस सीढ़ी पर
वह जीवन भर चढ़ता रहा,
वह सीढ़ी
शायद उसी दीवार से लगी थी
जिसके सहारे
वह जाना ही नहीं चाहता था।
हम उपलब्धियों को
जीवन का प्रमाण मान लेते हैं।
पद,
पुरस्कार,
प्रशंसा,
धन,
प्रतिष्ठा—
सब कुछ जोड़ते जाते हैं,
जैसे जीवन
कोई गणित का प्रश्न हो।
पर रात में,
जब कमरा शांत होता है,
और बाहरी दुनिया
दरवाज़े के बाहर रह जाती है,
तब भीतर से
एक बहुत धीमी आवाज़ आती है—
“क्या तुम सचमुच प्रसन्न हो?”
और उस प्रश्न का
कोई प्रमाणपत्र नहीं होता।
कोई पद
उसका उत्तर नहीं देता।
कोई पुरस्कार
उसका समाधान नहीं करता।
वहाँ केवल
मनुष्य होता है—
और उसका मन।
मनुष्य
दूसरों की दृष्टि में
अपना मूल्य खोजता है।
किसी ने प्रशंसा की—
हम प्रसन्न।
किसी ने आलोचना की—
हम विचलित।
किसी ने स्वीकार किया—
हम स्वयं को योग्य मान लेते हैं।
किसी ने अस्वीकार किया—
हम स्वयं पर प्रश्न करने लगते हैं।
अर्थात—
हमने अपने अस्तित्व की चाबी
दूसरों के हाथ में
दे रखी है।
फिर शिकायत करते हैं—
“लोग मुझे नियंत्रित करते हैं।”
कैसे न करें?
जब हमारे आत्म-मूल्य का
निर्णय ही
उनकी प्रतिक्रियाओं से होता है।
अहंकार
कभी-कभी
बहुत सूक्ष्म होता है।
वह केवल
“मैं सबसे श्रेष्ठ हूँ”
नहीं कहता।
वह यह भी कहता है—
“मैं सबसे अधिक पीड़ित हूँ।”
“मेरे साथ ही अन्याय हुआ।”
“मुझे कोई नहीं समझता।”
“मैं ही सही हूँ।”
अहंकार
श्रेष्ठता और हीनता—
दोनों में
छिप सकता है।
क्योंकि दोनों के केंद्र में
एक ही शब्द है—
मैं।
और फिर आता है
मोह।
मोह केवल
किसी व्यक्ति से नहीं होता।
मोह
विचारों से भी होता है।
अपनी छवि से,
अपने पद से,
अपने अतीत से,
अपनी सफलता से,
अपनी पीड़ा से,
अपनी धारणाओं से।
मनुष्य कभी-कभी
अपने दुःख से भी
मोह कर बैठता है।
वह उसे छोड़ना नहीं चाहता,
क्योंकि वर्षों से
वही उसकी पहचान बन चुका होता है।
दुःख चला जाए,
तो फिर—
वह स्वयं को
किस नाम से पुकारेगा?
कभी मन
कहता है—
क्षमा कर दो।
बुद्धि कहती है—
भूलना मत।
हृदय कहता है—
वह अपना था।
अहंकार कहता है—
उसने तुम्हें चोट पहुँचाई।
समय कहता है—
आगे बढ़ो।
और मनुष्य
एक ही व्यक्ति के भीतर
कई अदालतें लगाकर
बार-बार मुकदमा चलाता है।
निर्णय कभी नहीं आता।
क्योंकि अभियुक्त भी
हम हैं,
न्यायाधीश भी
हम,
गवाह भी
हम,
और पीड़ा भी
हमारी।
कभी-कभी
मन को समाधान नहीं चाहिए।
उसे केवल
सुना जाना चाहिए।
पर आधुनिक मनुष्य
हर पीड़ा का
तुरंत समाधान चाहता है।
दुःख है—
कारण खोजो।
अकेलापन है—
व्यस्त हो जाओ।
भय है—
सलाह लो।
असफलता है—
नई योजना बनाओ।
लेकिन कुछ अनुभव
समाधान के लिए नहीं आते।
वे हमें
परिपक्व बनाने आते हैं।
कुछ प्रश्नों के उत्तर
तुरंत नहीं मिलते।
उन्हें
जीना पड़ता है।
क्या हर उलझन
सुलझाई जा सकती है?
शायद नहीं।
कुछ उलझनें
जीवन की प्रकृति हैं।
प्रेम में
पूर्ण निश्चितता नहीं।
भविष्य में
पूर्ण ज्ञान नहीं।
सम्बन्धों में
पूर्ण नियंत्रण नहीं।
सफलता में
पूर्ण सुरक्षा नहीं।
और मृत्यु के सामने
मनुष्य की सारी योजनाएँ
अचानक छोटी हो जाती हैं।
इसलिए शायद
जीवन का उद्देश्य
हर प्रश्न का उत्तर पाना नहीं,
बल्कि—
कुछ प्रश्नों के साथ
शांति से जीना सीखना भी है।
भारतीय दर्शन ने
इस उलझन को
बहुत गहराई से देखा है।
उपनिषदों ने पूछा—
मैं कौन हूँ?
गीता ने पूछा—
मुझे क्या करना चाहिए?
बुद्ध ने पूछा—
दुःख क्यों है?
सांख्य ने पूछा—
पुरुष और प्रकृति का
सम्बन्ध क्या है?
योग ने पूछा—
मन की वृत्तियों को
कैसे समझा जाए?
वेदांत ने पूछा—
जो बदलता है
और जो नहीं बदलता,
उनमें वास्तविक क्या है?
ये प्रश्न
सिर्फ ग्रंथों के प्रश्न नहीं हैं।
ये मनुष्य के भीतर
आज भी जीवित हैं।
मनुष्य की उलझन का
एक बड़ा कारण यह भी है—
वह बदलती हुई चीज़ों में
स्थायित्व खोजता है।
यौवन बदलेगा।
शरीर बदलेगा।
सम्बन्ध बदलेंगे।
पद बदलेगा।
परिस्थितियाँ बदलेंगी।
समय बदलेगा।
विचार बदलेंगे।
फिर भी हम चाहते हैं—
सब कुछ
जैसा है
वैसा ही बना रहे।
पर जीवन का नियम
स्थिरता नहीं,
परिवर्तन है।
जो इसे स्वीकार नहीं करता,
वह परिवर्तन से नहीं,
अपने प्रतिरोध से
पीड़ित होता है।
शायद इसलिए
छोड़ देना भी
एक प्रकार का ज्ञान है।
हर लड़ाई लड़ना आवश्यक नहीं।
हर प्रश्न का उत्तर देना आवश्यक नहीं।
हर आलोचना का प्रतिवाद आवश्यक नहीं।
हर सम्बन्ध को बचाना आवश्यक नहीं।
हर स्मृति को ढोना आवश्यक नहीं।
हर अवसर को पकड़ना आवश्यक नहीं।
कभी-कभी
मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति
उसके पास रखने में नहीं,
छोड़ देने में होती है।
पर छोड़ना
भागना नहीं है।
वैराग्य
उदासीनता नहीं।
स्वीकार
पराजय नहीं।
मौन
कमजोरी नहीं।
और अकेलापन
हमेशा रिक्तता नहीं।
कभी-कभी
अकेलेपन में ही
मनुष्य पहली बार
अपनी आवाज़ सुनता है।
जब दुनिया
उससे कहती है—
“ऐसे बनो।”
तब भीतर से
एक धीमी आवाज़ पूछती है—
“पर मैं वास्तव में
कैसा हूँ?”
मनुष्य
अपने जीवन का
सबसे बड़ा रहस्य
स्वयं ही है।
वह संसार को
मापने के लिए
विज्ञान बनाता है,
आकाश को
समझने के लिए
दूरबीन बनाता है,
सूक्ष्म जगत को
देखने के लिए
सूक्ष्मदर्शी बनाता है,
पर अपने भीतर
झाँकने के लिए
उसे अभी भी
मौन की आवश्यकता पड़ती है।
और मौन—
आज के मनुष्य के लिए
शायद सबसे कठिन
प्रयोग है।
क्योंकि मौन में
कोई दूसरा नहीं होता।
न कोई प्रशंसा।
न कोई आलोचना।
न कोई दर्शक।
न कोई भूमिका।
न कोई प्रदर्शन।
वहाँ केवल—
तुम और तुम्हारा मन।
और तभी पता चलता है—
हमने जीवन भर
दूसरों को समझने की कोशिश की,
पर अपने भीतर बैठे
उस व्यक्ति से
ठीक से मिले ही नहीं
जो हर निर्णय में,
हर भय में,
हर इच्छा में,
हर सम्बन्ध में,
हर असफलता में,
और हर सफलता में
हमारे साथ था।
शायद मनुष्य की
सबसे बड़ी यात्रा
बाहर की नहीं,
भीतर की है।
पर्वतों पर जाना
सरल है।
समुद्र पार करना
सरल है।
नई दुनिया बनाना
सरल है।
पर अपने भीतर
उठते हुए एक विचार को
निष्पक्ष होकर देखना—
कितना कठिन है!
अपने क्रोध को
बिना उसका पक्ष लिए देखना।
अपने भय को
बिना उससे भागे देखना।
अपनी इच्छा को
बिना उसे सत्य मान लिए देखना।
अपने अहंकार को
बिना उसे नष्ट किए पहचानना।
और स्वयं को
बिना किसी भूमिका के
देख पाना—
शायद यही
आत्मचिन्तन की शुरुआत है।
मन की उलझनें
कभी-कभी
धागों की तरह नहीं होतीं
जिन्हें खींचकर
सुलझाया जा सके।
वे गाँठों की तरह होती हैं।
जितना जोर लगाओ,
उतनी कसती जाती हैं।
कुछ गाँठें
धीरे-धीरे खोलनी पड़ती हैं।
कुछ को
समय चाहिए।
कुछ को
समझ।
कुछ को
क्षमा।
कुछ को
स्वीकार।
और कुछ—
शायद जीवन भर
रह जाती हैं।
लेकिन हर गाँठ का
खुलना आवश्यक नहीं।
कभी-कभी
उस गाँठ के साथ
जीना सीखना भी
समाधान है।
हम अक्सर पूछते हैं—
“मेरी समस्या कब समाप्त होगी?”
शायद एक बेहतर प्रश्न है—
“इस समस्या के रहते
मैं कौन बन रहा हूँ?”
क्योंकि परिस्थितियाँ
हमेशा हमारे नियंत्रण में नहीं।
पर उनके बीच
हमारा निर्माण
कुछ हद तक
हमारे हाथ में है।
दुःख हमें
कड़वा बना सकता है,
या गहरा।
असफलता हमें
तोड़ सकती है,
या सिखा सकती है।
अकेलापन हमें
रिक्त कर सकता है,
या स्वयं से मिला सकता है।
आलोचना हमें
क्रोधित कर सकती है,
या अधिक सजग।
जीवन
हर अनुभव के साथ
एक विकल्प देता है—
मैं इससे क्या बनूँगा?
और शायद
यहीं से उलझन
धीरे-धीरे
अर्थ में बदलने लगती है।
प्रश्न
ज्ञान में।
पीड़ा
करुणा में।
असफलता
अनुभव में।
मौन
चिन्तन में।
एकांत
आत्मबोध में।
और जीवन—
एक यात्रा में।
मनुष्य को
पूर्ण उत्तर शायद कभी नहीं मिलेगा।
क्योंकि मनुष्य स्वयं
एक खुला प्रश्न है।
वह आज जो है,
कल वैसा नहीं होगा।
उसकी इच्छाएँ बदलेंगी।
उसकी समझ बदलेगी।
उसकी प्राथमिकताएँ बदलेंगी।
उसकी दृष्टि बदलेगी।
और शायद
उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि
यह नहीं होगी कि
उसने स्वयं को पूरी तरह
समझ लिया,
बल्कि यह होगी कि—
वह स्वयं को
समझने की यात्रा में
ईमानदार रहा।
तो यदि कभी
मन बहुत उलझ जाए,
तो तुरंत
हर गाँठ खोलने मत बैठना।
थोड़ा रुकना।
अपने भीतर
उठती आवाज़ों को
सुनना।
हर आवाज़ को
सत्य मत मान लेना।
हर भय को
भविष्य मत समझ लेना।
हर स्मृति को
वर्तमान मत बना देना।
हर इच्छा को
आवश्यकता मत मान लेना।
हर विचार को
अपना अस्तित्व मत समझ लेना।
और सबसे बढ़कर—
अपने मन की
हर हलचल को
अपनी पहचान मत बना लेना।
क्योंकि—
तुम अपने विचार नहीं हो।
तुम अपने भय नहीं हो।
तुम अपनी असफलताएँ नहीं हो।
तुम अपनी स्मृतियाँ नहीं हो।
तुम अपनी उपलब्धियाँ भी नहीं हो।
इन सबके पार
एक ऐसा साक्षी है
जो इन सबको
देख सकता है।
शायद—
उसी की खोज
मनुष्य की सबसे पुरानी
और सबसे कठिन यात्रा है।
और अंततः,
जब सारे प्रश्न
थक जाएँगे,
जब सारी बहसें
मौन हो जाएँगी,
जब जीत और हार
दोनों अर्थहीन लगने लगेंगे,
जब प्रशंसा और आलोचना
दोनों बाहर छूट जाएँगे,
जब भविष्य की चिंता
और अतीत का पश्चाताप
कुछ क्षणों के लिए
शांत हो जाएगा,
तब शायद
मन पहली बार
अपने भीतर से पूछेगा—
“क्या मुझे वास्तव में
कुछ और चाहिए?”
और भीतर से
शायद कोई उत्तर न आए।
केवल—
एक गहरा मौन।
एक सहज शांति।
एक ऐसी उपस्थिति
जिसे शब्दों में
बाँधा नहीं जा सकता।
तब समझ आएगा—
जीवन की सारी उलझनें
शायद इसलिए नहीं थीं
कि हमें कोई एक
अंतिम उत्तर मिल जाए।
वे इसलिए थीं
कि हम प्रश्नों के बीच
अपने भीतर
उतरना सीखें।
क्योंकि मनुष्य
सिर्फ वह नहीं
जो वह दुनिया को दिखाई देता है।
मनुष्य वह भी है—
जो वह स्वयं से छिपाता है,
जो वह खो चुका है,
जो वह पाने की प्रतीक्षा में है,
जो वह कह नहीं पाया,
जो वह क्षमा नहीं कर पाया,
जो वह भूल नहीं पाया,
और सबसे बढ़कर—
जो वह अभी तक
स्वयं में पहचान नहीं पाया।
इसलिए—
जब अगली बार
मन उलझे,
तो उससे युद्ध मत करना।
उसके पास बैठना।
पूछना—
“तू इतना व्याकुल क्यों है?”
शायद वह पहली बार
तुमसे बात करेगा।
और शायद
उस बातचीत में
कोई समाधान न मिले—
लेकिन
तुम्हें स्वयं से मिलने की शुरुआत मिल जाए।
— प्रभाष चंद्र
