मन के भीतर चलती उस अनन्त सभा का वृत्तान्त, जहाँ हर विचार स्वयं को सत्य समझता है
प्रभाष चंद्र
रात ने
शहर के माथे पर
नींद की एक गहरी, काली पट्टी बाँध दी थी;
सड़कें सुनसान थीं,
खिड़कियों के भीतर
दीयों की लौ भी थककर
धीरे-धीरे झुक रही थी,
और एक मनुष्य
अपने ही कमरे में बैठा
अपने ही भीतर से
आने वाली उन आवाज़ों को सुन रहा था
जिन्हें दिन के शोर में
वह अक्सर सुन नहीं पाता था।
बाहर
घड़ी नियमित अंतराल पर
समय की घोषणा कर रही थी,
और भीतर—
मनुष्य का मन
समय से भी पुराना
एक अदृश्य दरबार लगाए बैठा था।
वहाँ कोई सिंहासन नहीं था,
फिर भी हर विचार
स्वयं को राजा समझता था;
कोई न्यायालय नहीं था,
फिर भी हर भावना
अपनी-अपनी याचिका लेकर उपस्थित थी;
और कोई घंटी नहीं बजी,
फिर भी—
संवाद आरम्भ हो गया।
सबसे पहले
एक उजली, धैर्यवान आवाज़ उठी—
“मैं आशा हूँ।”
“मैं वह दीपक हूँ
जो तूफ़ान के आने पर
हवा से लड़ता नहीं,
बस अपनी लौ को
दोनों हथेलियों के बीच
थोड़ा और सँभाल लेता है।
तुम मुझे मूर्ख कह सकते हो,
स्वप्नदर्शी कह सकते हो,
यहाँ तक कि यह भी कह सकते हो
कि मैं वास्तविकता से अनजान हूँ;
पर स्मरण रखना—
इतिहास की प्रत्येक नई सुबह
किसी एक मनुष्य की
उस जिद से जन्मी है
जिसने अँधेरे से पूछा था—
‘क्या तुम्हारा अधिकार
सदैव रहेगा?’”
अंधकार के कोने से
एक गहरी, कुछ काँपती हुई आवाज़ आई—
“और मैं भय हूँ।”
“मेरी हँसी मत उड़ाना, आशा!
तुम्हारी लौ सुंदर है,
पर मैंने कितनी ही रातों में
उसके पास बैठकर
मनुष्य की उँगलियों को काँपते देखा है।
तुम कहती हो—
‘फिर से प्रयास करो।’
मैं पूछता हूँ—
‘यदि इस बार भी वही हुआ तो?’
यदि वही दरवाज़ा
फिर से बंद मिला तो?
यदि वही व्यक्ति
फिर से छल कर गया तो?
यदि जिस सपने को
तुमने इतने प्रेम से सींचा है,
वही एक दिन
तुम्हारे सामने राख बनकर रह गया तो?
मैं डराता नहीं हूँ—
मैं चेताता हूँ।
हाँ, कभी-कभी मेरी आवाज़
बहुत ऊँची हो जाती है,
लेकिन यह मत भूलो
कि खाई के किनारे खड़ा
‘सावधान’ का पत्थर
यात्री का शत्रु नहीं होता।”
आशा ने मुस्कराकर कहा—
“तुम्हारी बात में तर्क है, भय,
पर एक छोटी-सी दिक्कत भी है—
तुम कभी-कभी
दरवाज़े पर ‘खतरा’ लिखकर
उसे हमेशा के लिए बंद कर देते हो।”
भय थोड़ा सकुचाया।
फिर बोला—
“और तुम्हारी एक आदत भी कम हास्यास्पद नहीं, आशा।
तुम खिड़की पर बैठकर
सूर्योदय की कल्पना करती रहती हो,
कभी-कभी यह देखे बिना
कि सामने की पहाड़ी अभी कितनी ऊँची है।”
कमरे में
पहली बार हल्की-सी हँसी तैर गई।
तभी एक गंभीर आवाज़ आई—
“बस, अब तुम दोनों
अपनी-अपनी दुकान समेटो।”
वह विवेक था।
“आशा, तुम आवश्यक हो,
क्योंकि बिना संभावना के
मानव-जीवन पत्थर हो जाता है।
भय, तुम भी आवश्यक हो,
क्योंकि बिना सावधानी के
साहस कभी-कभी
मूर्खता बन जाता है।
पर सुनो—
निर्णय न आशा अकेली करेगी,
न भय अकेला।
जब नाव नदी में उतरती है,
तो पतवार को उत्साह भी चाहिए
और धारा का ज्ञान भी;
सिर्फ यह कह देना कि
‘हम पार पहुँचेंगे’ पर्याप्त नहीं,
और यह मान लेना कि
‘बहाव हमें डुबो देगा’ भी
अंतिम सत्य नहीं।
जीवन
दोनों के बीच
संतुलन की कला है।”
तभी
एक तेज़, कुछ अकड़ी हुई आवाज़
बीच में आ गई—
“और मुझे भूल गए?”
वह अहंकार था।
“मैं न रहूँ
तो तुममें से आधे लोग
एक-दूसरे की बात
सुनकर नहीं,
सुनाकर रह जाएँगे।
मैंने ही तो
कई बार मनुष्य को
खड़े होकर यह कहने का साहस दिया है कि—
‘नहीं, यह अन्याय है;
मैं इसे स्वीकार नहीं करूँगा।’
तो मुझे खलनायक मत बनाइए।
हाँ, यह अलग बात है कि
जब मैं आवश्यकता से अधिक बढ़ जाता हूँ
तो छोटे-से ‘स्वाभिमान’ को
एक बहुत बड़ा ‘मैं’ बना देता हूँ।”
विवेक हँसा—
“तुम्हें अपना परिचय स्वयं से बेहतर कोई दे ही नहीं सकता, अहंकार।”
अहंकार ने भौंहें चढ़ाईं—
“मैं केवल आत्मसम्मान की रक्षा करता हूँ।”
तभी पीछे से
कोमल स्वर में उत्तर आया—
“नहीं, कभी-कभी तुम
आत्मसम्मान के वस्त्र पहनकर
आहत-अभिमान की रक्षा करते हो।”
वह करुणा थी।
करुणा ने धीरे से कहा—
“जिसने तुम्हें दुख पहुँचाया,
वह उचित था—ऐसा मैं नहीं कहती।
जिसने अन्याय किया,
उसे निर्दोष मानो—यह भी नहीं कहती।
मैं केवल इतना कहती हूँ
कि किसी दूसरे के अपराध को
अपने जीवन की स्थायी पहचान मत बनने दो।
क्षमा का अर्थ यह नहीं
कि घाव कभी लगा ही नहीं था;
क्षमा का अर्थ है—
घाव को जीवन का स्वामी बनने से रोक देना।
तुम्हें जिसने तोड़ा,
उसे अपने भीतर
इतनी बड़ी जगह क्यों दे रखी है
कि उसके चले जाने के बाद भी
वह तुम्हारे दिन तय करे,
तुम्हारी रातें तय करे,
तुम्हारे निर्णय तय करे?”
अहंकार कुछ क्षण मौन रहा।
फिर बोला—
“पर जिसे क्षमा कर दिया,
उससे दूरी कैसे रखूँ?”
करुणा मुस्कराई—
“देखो, क्षमा का अर्थ
दरवाज़ा खोल देना नहीं है।
कभी-कभी क्षमा यह है
कि तुम खिड़की बंद कर दो,
दीवार ऊँची कर दो,
लेकिन मन के भीतर
नफ़रत का चूल्हा जलता न छोड़ो।”
तभी
एक थकी हुई आकृति
धीरे-धीरे आगे आई।
“मुझे कोई भूल नहीं सकता।”
वह अतीत था।
“मैं तुम्हारी स्मृतियों का
पुराना नगर हूँ।
मेरी कुछ गलियों में
माँ की गोद की गर्मी है,
कुछ रास्तों पर
स्कूल की घंटियाँ हैं,
कहीं मित्रता की हँसी है,
कहीं बिछड़ने की गंध,
कहीं सफलता का पहला स्वाद,
और कुछ मकानों पर
आज भी पछतावे की
जंग लगी हुई सांकलें लटक रही हैं।
तुम मुझे छोड़ना चाहते हो,
पर सुनो—
मैं तुम्हारा कारागार नहीं,
तुम्हारी पृष्ठभूमि हूँ।
हाँ, मैं तुम्हें पीछे खींच सकता हूँ,
यदि तुम मुझे भविष्य समझ बैठो;
पर मैं तुम्हें जड़ भी दे सकता हूँ,
यदि तुम मुझे अनुभव की तरह पढ़ो।”
भविष्य ने
अभी तक चुप खड़े-खड़े
अपनी बारी की प्रतीक्षा की थी।
अब वह मुस्कराया।
“इतना इतिहास मत बघारो, अतीत।
तुम्हारी समस्या यह है
कि जो कुछ हुआ,
उसे ‘होना ही था’ मान लेते हो।”
अतीत ने उत्तर दिया—
“और तुम्हारी समस्या यह है
कि जो कुछ अभी हुआ ही नहीं,
उसे लेकर आधी रात को
मनुष्य को जगाए रखते हो।”
भविष्य हँस पड़ा—
“सच कहूँ,
मैं बेचारा बड़ा बदनाम हूँ।
लोग मेरे पास आते नहीं,
फिर भी मेरी सबसे अधिक चर्चा करते हैं।”
मनुष्य के भीतर
फिर एक हल्की मुस्कान उभरी।
भविष्य बोला—
“मैं केवल संभावना हूँ।
तुम मुझे भय से भर देते हो,
कभी उम्मीद से,
कभी महत्वाकांक्षा से,
कभी आशंका से।
तुम्हें लगता है
मैं तुम्हारे हाथ में हूँ।
पर मैं अभी अस्तित्व में ही कहाँ हूँ?
मैं तो
तुम्हारे वर्तमान के
बीजों से बन रही
एक सम्भावित ऋतु हूँ।”
तभी वर्तमान ने कहा—
“तुम दोनों अपनी-अपनी बात कह चुके।
अतीत, तुम स्मृति हो।
भविष्य, तुम संभावना हो।
पर एक बात
तुम दोनों भूल जाते हो—
जीवन तुममें नहीं,
मेरे भीतर घटता है।
निर्णय मेरे पास आता है।
कर्म मेरे भीतर होता है।
प्रेम मेरे भीतर मिलता है।
क्षमा मेरे भीतर संभव है।
परिवर्तन मेरे भीतर जन्म लेता है।
मनुष्य बार-बार
अतीत में लौटता है
और भविष्य में भागता है,
लेकिन उसका जीवन
हर बार
मेरे ही दरवाज़े पर खड़ा मिलता है।”
तभी
एक करुण, लगभग पछतावे से भीगी आवाज़ आई—
“मुझे तो किसी ने बुलाया ही नहीं।”
सबने मुड़कर देखा।
वह पश्चाताप था।
उसके हाथ में
पुराने कागज़ों का एक गठ्ठर था।
वह बोला—
“मेरे पास
‘काश’ से भरे हुए
बहुत सारे पन्ने हैं।
काश, मैंने वह बात
उस दिन न कही होती।
काश, मैंने उस व्यक्ति को
थोड़ा और समय दिया होता।
काश, मैंने अवसर को
पहचान लिया होता।
काश, मैंने अपने पिता से
एक बार और बात कर ली होती।
काश, मैंने वह निर्णय
कुछ सोचकर लिया होता।
लेकिन मेरी सबसे बड़ी विडम्बना यह है
कि मैं हमेशा
घटना के बाद पैदा होता हूँ।”
समय ने
उसके कंधे पर हाथ रखा।
“और इसलिए तुम्हारी उपयोगिता
दर्द में नहीं, सीख में है।”
पश्चाताप ने पूछा—
“क्या मुझे समाप्त किया जा सकता है?”
समय बोला—
“नहीं।
पर तुम्हें
परिवर्तित किया जा सकता है।
दुःख से सीख बनो,
सीख से विवेक,
विवेक से अगला निर्णय।
तभी तुम बोझ नहीं रहोगे।”
तभी बुद्धि ने
धीरे से कहा—
“तुम सब
मनुष्य को अलग-अलग दिशाओं में खींचते हो,
पर तुममें से किसी एक को
मनुष्य का सम्पूर्ण स्वामी बना देना
सबसे बड़ी भूल है।
आशा बिना विवेक
स्वप्नदोष बन सकती है।
भय बिना संतुलन
कैदखाना।
अहंकार सीमा भूल जाए
तो विनाश।
करुणा विवेक से विहीन हो
तो आत्म-विसर्जन।
अतीत यदि वर्तमान पर बैठ जाए
तो जीवन स्मारक बन जाता है।
भविष्य यदि वर्तमान को निगल जाए
तो जीवन अनुमान बन जाता है।
पश्चाताप यदि सीख न बने
तो आत्म-दण्ड बन जाता है।
और विचार यदि परीक्षा से बचता रहे
तो वह सत्य नहीं,
सिर्फ जिद है।”
एक गंभीर मौन छा गया।
फिर जिज्ञासा ने पूछा—
“तो सत्य कैसे मिलेगा?”
बुद्धि बोली—
“पहले यह मानना बंद करो
कि जो तुम सोचते हो,
वही सत्य है।
फिर पूछो—
क्यों?
कैसे?
किस आधार पर?
और यदि कोई उत्तर तुम्हें बहुत शीघ्र मिल जाए,
तो एक बार यह भी पूछ लेना—
‘क्या मैंने केवल इसलिए इसे सही मान लिया
क्योंकि इससे मुझे मानसिक सुविधा मिली?’”
अब आशा ने
धीरे से कहा—
“और यदि उत्तर न मिले तो?”
जिज्ञासा बोली—
“तो प्रश्न को जीवित रखो।”
विवेक बोला—
“लेकिन प्रश्न को पूजा मत बना देना।”
बुद्धि मुस्कराई—
“और उत्तर को
ईश्वर का दर्जा मत देना।”
इतने में
एक शरारती आवाज़ सुनाई दी—
“आप सब बहुत गंभीर हो गए हैं।”
सबने उसकी ओर देखा।
वह हँसी थी।
“मनुष्य को केवल दर्शन से मत चलाइए।
कभी-कभी
उसे अपने ही ऊपर हँसने दीजिए।
वह सुबह उठकर
कहता है—
‘आज से मैं बिल्कुल नहीं चिढ़ूँगा।’
फिर आधे घंटे बाद
चाय ठंडी मिलने पर
मानो पूरी सभ्यता के पतन की घोषणा कर देता है।
कभी वह कहता है—
‘अब मैं अतीत को छोड़ चुका हूँ’
और फिर रात को
पुराने संदेश पढ़ता हुआ
ऐसे बैठा रहता है
जैसे इतिहास विभाग की
रात्रिकालीन ड्यूटी उसी की हो।”
कमरे के भीतर
पहली बार
ठहाका गूँजा।
हँसी ने कहा—
“याद रखो—
जो स्वयं को बहुत गंभीरता से लेता है,
वह कभी-कभी
अपने ही विचारों का
सबसे बड़ा कैदी बन जाता है।
थोड़ी विनम्रता,
थोड़ी हँसी,
थोड़ा आत्म-परिहास—
मनुष्य के भीतर
बहुत-सी गाँठें खोल सकते हैं।”
अब स्मृति ने
धीमे स्वर में कहा—
“पर क्या हर स्मृति
रखी जानी चाहिए?”
अतीत बोला—
“नहीं।
कुछ स्मृतियाँ
दर्पण हैं।
कुछ दीपक।
कुछ चेतावनी।
और कुछ—
पुराने घाव,
जिन्हें हम
बार-बार कुरेदते हैं
केवल इसलिए कि
वे कभी हमारे थे।”
करुणा ने कहा—
“स्मृति को मिटाना मत।
लेकिन उसे
पूजा भी मत बनाना।”
तभी
सबसे शांत आवाज़ उठी।
“क्या मैं बोल सकती हूँ?”
सब चुप हो गए।
वह मौन था।
मौन ने कहा—
“तुम सबने बहुत कहा।
अब थोड़ा सुनो।
तुम्हारी समस्या यह नहीं कि
मन में बहुत विचार हैं।
समस्या यह है
कि तुम हर विचार को
तुरंत निर्णय बना देते हो।
एक विचार आया—
तुमने उसे सत्य मान लिया।
एक भय आया—
तुमने उसे भविष्य मान लिया।
एक इच्छा आई—
तुमने उसे आवश्यकता मान लिया।
एक स्मृति आई—
तुमने उसे वर्तमान मान लिया।
एक प्रशंसा मिली—
तुमने उसे अपनी पहचान मान लिया।
एक आलोचना मिली—
तुमने उसे अपना मूल्य मान लिया।
विचारों को गुजरने की जगह दो।
हर बादल को वर्षा होना आवश्यक नहीं।
हर लहर को
तूफ़ान होना आवश्यक नहीं।
हर विचार को
कर्म में बदलना आवश्यक नहीं।”
मौन के बाद
बहुत देर तक
कोई कुछ नहीं बोला।
मनुष्य
अंदर से सुन रहा था।
फिर उसने
धीरे से पूछा—
“तो मैं कौन हूँ?”
सभी आवाज़ें
एक-दूसरे की ओर देखने लगीं।
भय बोला—
“मेरी रक्षा करते हो,
तुम मुझमें कुछ हो।”
आशा बोली—
“मेरी ओर बढ़ते हो,
तुम मुझमें कुछ हो।”
अतीत बोला—
“मुझसे बने हो,
तुम मुझमें कुछ हो।”
भविष्य बोला—
“मुझमें बनने वाले हो,
तुम मुझमें कुछ हो।”
अहंकार बोला—
“मैं तुम्हारा ‘मैं’ हूँ।”
करुणा बोली—
“मैं तुम्हारा ‘हम’ हूँ।”
विवेक बोला—
“मैं तुम्हारा चयन हूँ।”
मौन मुस्कराया।
फिर साक्षी ने उत्तर दिया—
“तुम इनमें से कोई एक नहीं।
तुम वह भी हो
जो इन सबको
देख सकता है।
तुम्हारे भीतर
विचार उठते हैं,
भावनाएँ आती हैं,
निर्णय बनते हैं,
विश्वास बदलते हैं—
और फिर भी
तुम उन्हें देख सकते हो।
याद रखो—
तुम्हारे भीतर विचारों की सभा है,
पर तुम केवल उस सभा के
किसी एक सदस्य का नाम नहीं हो।”
मनुष्य ने
आँखें बंद कर लीं।
अब उसे लगा—
उसके भीतर
कोई युद्ध नहीं चल रहा।
हाँ, मतभेद थे।
बहसें थीं।
कहीं आशा
भय से उलझ रही थी,
कहीं अहंकार
करुणा से,
कहीं अतीत
भविष्य से,
कहीं विवेक
आवेग से—
पर अब वे शत्रु नहीं लग रहे थे।
वे—
उसके ही भीतर
जीवन के अलग-अलग अर्थ लेकर
बैठे हुए सहयात्री थे।
आशा ने कहा—
“मैं तुम्हें आगे देखना सिखाऊँगी।”
भय ने कहा—
“और मैं यह ध्यान रखूँगा
कि तुम आँखें बंद करके
न दौड़ पड़ो।”
विवेक ने कहा—
“मैं तय करूँगा
किस दिशा में जाना सार्थक है।”
करुणा बोली—
“और यात्रा में
किसी को कुचलकर
जीतने मत देना।”
अतीत ने कहा—
“मैं याद दिलाऊँगा
कि तुम कहाँ से आए हो।”
भविष्य बोला—
“मैं याद दिलाऊँगा
कि तुम कहाँ तक जा सकते हो।”
वर्तमान ने कहा—
“और मैं कहूँगा—
अब चलो।”
खिड़की के बाहर
रात की अंतिम परतें
धीरे-धीरे उतर रही थीं।
आकाश के पूर्वी छोर पर
हल्का-सा उजास फैलने लगा।
मनुष्य उठ खड़ा हुआ।
उसने कोई महान शपथ नहीं ली।
किसी समस्या का
अंतिम समाधान नहीं पाया।
अपने सारे भय को
समाप्त नहीं किया।
अपने सारे प्रश्नों का
उत्तर नहीं पाया।
फिर भी—
उसके भीतर
कुछ बदल गया था।
क्योंकि अब वह जानता था—
मन की शांति
विचारों के मर जाने में नहीं,
उनके बीच एक ऐसा संवाद जन्म लेने में है
जहाँ आशा अंधी न हो,
भय निरंकुश न हो,
अहंकार सर्वाधिपति न हो,
करुणा कमजोर न हो,
विवेक कठोर न हो,
अतीत कैद न बने,
भविष्य भय न बने,
और वर्तमान हाथ से फिसल न जाए।
वह दरवाज़े तक पहुँचा।
एक क्षण को रुका।
पीछे मुड़कर
अपने ही भीतर की सभा को देखा।
फिर मुस्कराकर कहा—
“बहस करते रहना,
पर आज निर्णय मुझे लेना है।”
विवेक मुस्कराया।
आशा ने दीपक ऊँचा किया।
भय ने रास्ते की ओर देखा।
करुणा ने साथ चलने का संकेत दिया।
अतीत ने सिर हिलाया।
भविष्य ने दूर क्षितिज की ओर इशारा किया।
वर्तमान ने कहा—
“अब?”
मनुष्य ने उत्तर दिया—
“अब।”
और वह चल पड़ा।
क्योंकि जीवन का अर्थ
सभी विचारों को मौन कर देना नहीं है;
बल्कि—
उनके बीच ऐसा संतुलन खोज लेना है
जहाँ विचार दिशा बनें,
भावना संवेदना बने,
विवेक निर्णय बने,
अनुभव ज्ञान बने,
और मनुष्य—
अपने भीतर की इस अनन्त सभा से गुजरते हुए
धीरे-धीरे
स्वयं अपना अर्थ रच सके।
— प्रभाष चंद्र
