
बाल-अस्तित्व—यह शब्द जितना सरल प्रतीत होता है, उतना ही गहन अपने अर्थ और विस्तार में है। हम प्रायः बच्चे को आयु की सीमाओं में बाँध देते हैं, उसे कक्षा, पाठ्यपुस्तकों और अनुशासन की परिधि में परिभाषित करने का प्रयास करते हैं; परंतु क्या वास्तव में इस चेतना को इतनी संकीर्ण परिभाषा में समेटा जा सकता है? क्या यह केवल एक शारीरिक अवस्था है, या उससे कहीं अधिक—एक संवेदन, एक जिज्ञासा, एक अनवरत प्रवाह?
बच्चा वस्तुतः एक प्रश्न है—जो स्वयं उत्तर बनने की यात्रा पर है। वह जन्म से ही संसार को समझने का प्रयत्न नहीं करता, वह उसे अनुभव करता है, उसे जीता है। उसकी दृष्टि में प्रत्येक वस्तु नवीन है, प्रत्येक क्षण एक उद्घाटन है। वह न पूर्वाग्रहों से बंधा है, न सीमाओं से। वह अपने भीतर एक स्वाभाविक स्वतंत्रता और निष्कपटता लिए होता है, जो उसे सत्य के निकटतम बनाती है।
“बच्चा वह नहीं जो केवल सीखता है, बल्कि वह है जो संसार को पुनः रचता है।”
— प्रभाष चन्द्र | prabhash.blog
जब हम बच्चे को केवल ‘शिक्षार्थी’ मान लेते हैं, तब हम उसकी मौलिकता के साथ अन्याय करते हैं। शिक्षा का उद्देश्य बच्चे को ढालना नहीं, बल्कि उसे समझना और उसकी अंतर्निहित संभावनाओं को जागृत करना होना चाहिए। बच्चा कोई खाली पात्र नहीं है जिसे ज्ञान से भर दिया जाए; वह एक प्रज्वलित दीप है, जिसे केवल दिशा की आवश्यकता है।
“शिक्षा का प्रथम दायित्व यह नहीं कि वह बच्चे को बदल दे, बल्कि यह कि वह उसे स्वयं होने की स्वतंत्रता दे।”
— प्रभाष चन्द्र
बच्चे की दुनिया में कल्पना का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। जहाँ वयस्क यथार्थ की कठोरता में बंधे होते हैं, वहीं बच्चा कल्पना के पंखों से आकाश को छूता है। उसके लिए एक साधारण वस्तु भी असाधारण हो सकती है—एक लकड़ी की छड़ी घोड़ा बन सकती है, एक कागज़ का टुकड़ा उड़ता हुआ स्वप्न। यह कल्पनाशीलता ही उसकी सृजनात्मकता का मूल है।
परंतु आधुनिक शिक्षा प्रणाली में, हम अनजाने में इस कल्पना को सीमित कर देते हैं। हम उसे उत्तर सिखाते हैं, प्रश्न पूछना नहीं; हम उसे अनुकरण सिखाते हैं, सृजन नहीं। परिणामस्वरूप, बच्चा धीरे-धीरे अपने भीतर की उस स्वाभाविक जिज्ञासा को खोने लगता है, जो उसके अस्तित्व का मूल तत्व है।
“जब बच्चा प्रश्न पूछना छोड़ देता है, तब शिक्षा का सबसे बड़ा उद्देश्य विफल हो जाता है।”
— प्रभाष चन्द्र
बच्चे को समझना केवल शैक्षिक आवश्यकता नहीं, यह एक मानवीय दायित्व है। यह स्वीकार करना आवश्यक है कि प्रत्येक बच्चा अद्वितीय है—उसकी गति, उसकी रुचि, उसकी अभिव्यक्ति, सब कुछ भिन्न है। उसे एक समान मापदंडों में बाँधना, उसकी व्यक्तिगत पहचान को नकारने के समान है।
महान चिंतकों ने भी इस विशिष्टता को स्वीकार किया है—
“Every child is an artist. The problem is how to remain an artist once we grow up.”
— Pablo Picasso
यह कथन यह सोचने पर विवश करता है कि क्या हमारी शिक्षा प्रणाली बच्चे के भीतर के कलाकार को जीवित रख पाती है, या उसे धीरे-धीरे समाप्त कर देती है।
अतः आवश्यक है कि हम बच्चे को केवल भविष्य के नागरिक के रूप में न देखें, बल्कि वर्तमान के सृजक के रूप में स्वीकार करें। यह केवल ‘बनने’ की प्रक्रिया में नहीं है; यह ‘होने’ की पूर्णता में भी है। उसकी हँसी, उसके प्रश्न, उसकी कल्पनाएँ—ये सब उसके अस्तित्व के अभिन्न अंग हैं, जिन्हें संजोना और संरक्षित करना हमारा कर्तव्य है।
“बच्चा कोई अधूरा वयस्क नहीं है; वह अपने आप में एक संपूर्ण अस्तित्व है।”
— प्रभाष चन्द्र
अंततः, बच्चे को समझना स्वयं को समझने की यात्रा है। क्योंकि जिस निष्कपटता, जिज्ञासा और स्वतंत्रता को हम बच्चे में देखते हैं, वही हमारे भीतर भी कभी विद्यमान थी। यह हमें स्मरण कराता है कि जीवन का सार सरलता में है, और सृजन का मूल जिज्ञासा में।
इसलिए, यदि एक बेहतर समाज का निर्माण करना है, तो बच्चों को बदलने की नहीं, उन्हें समझने की आवश्यकता है—उनकी दृष्टि से संसार को देखने की आवश्यकता है। तभी एक ऐसी शिक्षा और संस्कृति का निर्माण संभव है, जो वास्तव में मानवीय, जीवंत और सार्थक हो।
— प्रभाष चन्द्र
शिक्षाविद् एवं विचारक
